​क्यों सांवरे घनश्याम कहूँ

​क्यों सांवरे घनश्याम कहूँ

तुम वो श्वेत सी लौ हो

वो धीमी लौ जो शांत करे

इस ज्वाला रूपी मेरे मन को

 
जो आऊँ तेरे द्वार पर

मैं खुद से ही अलग हो जाऊँ

न पलक झपकने का जी चाहे

बस तुम्हें निहारती ही रेह जाऊँ

 
जो आँखों से अश्रू बहें

वो प्यार मे तेरे बेहते हैं

कुछ बोल न पाऊँ कुछ माँग न पाऊँ

बस तुझे निहार कर सोचते हैँ

 
तू माखन चोर तू नटखट है

भोला और दातार है

क्या देखा तूने मुझमे

झोली से अपनी इतना दिया है

 
हे मुरलीधर कृष्ण कनहैया

क्या तेरी भी माया है

जो देखे तुझे एक नज़र प्यार से

राधे कृष्ण ही गाता है

 
मोह मे खो जाती हूँ अब भी

याद न तू रेहता गोपाला

पर पीछे मुड़कर देखूं मैं तो

तू मंद मुसकाए खड़ा नंदलाला

 
करती ना मैं कुछ तू सुन

कराता मुझसे सब तू है

तू ही मुझमे है तू सब में

गलत राह ना निकलना है

 
मुझे पता है, तू साथ है

गलती मैं ही करती हूँ

क्या करूँ इंसान हूँ मैं भी

तभी तो तेरा सहारा है

 
इस जीवन का झूला तू है

मुरली तेरी मंद हवा

गीत हैं वो रंग, इस जीवन के

जिसमे तेरा साथ छुपा

 
मंद मंद हवा, हरियाली,

जो हाथ लगाए तूने जब

झूला मेरा लेहराया

छूने चला उस अंबर तक

 
ढूँढा जबसे साथ तेरा

लत सी लग गई अब तो

क्यों सांवरे घनश्याम कहें वो

राधे कृष्ण बोलें जो ॥

 
शाम्भवी

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2 thoughts on “​क्यों सांवरे घनश्याम कहूँ

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